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चंद्रपूर - कोई भी त्योहार हमारे समाज की बनावट का नमूना होता है। जिस समाज को समझना हो उस समाज के तीज त्योहारों गौर से देखिए हमारे देश हर त्योहार हर एक के लिए रहा है यहां तक कि दुनिया भर में त्योहारों के लिए सबके लिए दरवाजे खोल दिए जाते है।
जिससे जाहिर होता है कि यह एक दिखाना चाहते है अब आप पूरे महीने के रमज़ान के बाद आने वाली ईद को देख लीजिए यह मुसलमानों के मिज़ाज की खिड़की है इसमें झांक कर आप उस समाज के अन्दर चलने वाली तमाम क्रियाओं जान सकते है। ईद इंसान को इंसान से जोड़ने का एक फलसफा है यह त्योहार जो अपनी सुबह की शुरुवात से बताता है कि हर एक को गले लगा लो गले लगाने में कोई हिन्दू और न कोई मुस्लिम न कोई ऊँचा है न कोई नीचा न कोई काला है और न कोई गोरा सारे फर्क मिटा देने का नाम ईद है ईद रमज़ान जैसे कठिन अनुशाषित त्याग और समर्पण के तीस दिनों के बाद आती है। यह ईद अल्लाह (ईश्वर)का वह इनाम है जो आपको रमज़ान के सेवाओं के बाद मिलता है।
दूसरा एक पहलू है आर्थिक समानता का ईद के नमाज़से पहले जकात और फितरा आता है जिसे आपको अपने से कमज़ोर को अपनी सालभर की आमदनी का कुछ हिस्सा देकर आर्थिक सुरक्षा का अहसास भी कराना होता है यही नही ईद के रोज़ अपने से कमज़ोरों को ईदी देकर अदा करना होता है। यह तीनों नियम बताते है कि आपने किसी पर एहसान नही किया बल्कि यह आपका कर्तव्य है इसीलिए इसका ख्याल रखना होता है कि इन्हें लेनेवाले की आंखों में शर्म न आनी पाए।
ईद के द्वारा कितनी खूबसूरती से समाज को संघटित और विकसित किया जा सकता है।
जो भी बात कमजोर को मजबूत बनाने की हो उसमें एक न एक समाजी फलसफा तो पिरोया ही होता है तभी तो हमारे यहाँ मुहावरा प्रचलित है "तुम्हारी तो ईद हो गई" यानी आर्थिक और सामाजिक तरक्की अगर यह त्योहार नही होते तो इंसान का दिल मदद को कितना आगे आता। निर्मिक ने हर उस जरूरत को जो समाज की गिरह बांधती है उसे त्योहारों परंपराओं में पिरो दिया ताकि वह एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता तक पहुचती रहे ईद में अगर आपके दिल मे मानवमात्र की सेवा का भाव बराबरी और कमजोर को सहारा देने का भाव उत्पन्न नही हो रहा तो आप अल्लाह (ईश्वर )की मंशा के विरुद्ध केवल जी रहे है।
सिवइयों के हर रेशे में गूंथे सेवा प्रेम त्याग और समर्पण को समझ जाए तो हर कोई उसकी मिठास आपके चरित्र से महसूस करेंगा यही ईद का आध्यत्मिक संदेश है।
